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आरबीआई की आकस्मिक निधि पर सरकार की नजर, क्या खतरे में है देश की आर्थिक सुरक्षा?

आरबीआई के रिकॉर्ड अधिशेष हस्तांतरण पर उठे सवाल, क्या खत्म हो रही है वित्तीय सुरक्षा?

भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए केंद्र सरकार को अतिरिक्त मुनाफ़े के रूप में 2,86,588.46 करोड़ रुपये हस्तांतरित करने का निर्णय लिया है। यह अब तक का सबसे बड़ा अधिशेष हस्तांतरण माना जा रहा है। इस निर्णय के बाद देश की आर्थिक नीतियों और आरबीआई की आरक्षित निधि के उपयोग को लेकर बहस तेज हो गई है।
लेख के अनुसार, आरबीआई की आरक्षित निधि देश की वित्तीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार होती है। इस निधि का एक हिस्सा आकस्मिक परिस्थितियों और आर्थिक संकटों से निपटने के लिए सुरक्षित रखा जाता है। लेखक का आरोप है कि मोदी सरकार ने 2014 के बाद से आरबीआई की इस आरक्षित निधि में लगातार हस्तक्षेप बढ़ाया है और विशेषज्ञ समितियों के माध्यम से आरक्षित पूंजी की सीमा घटाकर केंद्र सरकार को अधिक राशि हस्तांतरित कराने का रास्ता बनाया है।
लेख में कहा गया है कि 2003 से 2014 के बीच आरबीआई ने केंद्र सरकार को कुल 2.06 लाख करोड़ रुपये दिए थे, जबकि 2014 से 2026 के बीच यह राशि बढ़कर 14.28 लाख करोड़ रुपये हो गई है। पिछले तीन वर्षों में ही 7.66 लाख करोड़ रुपये का हस्तांतरण किया गया है।
लेखक का तर्क है कि आरबीआई की पूंजीगत आरक्षित निधि संकट के समय देश के लिए सुरक्षा कवच का कार्य करती है और इसका उपयोग नियमित सरकारी खर्चों के लिए करना वित्तीय दृष्टि से उचित नहीं है। उन्होंने मांग की है कि आरबीआई जनता को यह बताए कि आकस्मिक आरक्षित निधि में वर्तमान में कितनी राशि शेष है और केंद्र सरकार पिछले वर्षों में प्राप्त अधिशेष राशि के उपयोग का पूरा विवरण सार्वजनिक करे।
लेखक का मानना है कि आरक्षित निधि का लगातार उपयोग देश के वित्तीय क्षेत्र की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए खतरा पैदा कर सकता है और इस विषय पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा की आवश्यकता है।
(लेखक बैंक एम्प्लाइज फेडरेशन ऑफ इंडिया (बेफी) के अध्यक्ष हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।)
नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं। इससे सभी पाठकों या प्रकाशक की सहमति आवश्यक रूप से नहीं मानी जानी चाहिए।

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