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विष्णु नागर और राजेंद्र शर्मा के लेखों में मौजूदा राजनीतिक माहौल, चुनावी व्यवस्था और सत्ता की कार्यशैली पर सवाल।

skn Bharat Patna

जमुई/पटना। समकालीन राजनीतिक परिस्थितियों को व्यंग्य के माध्यम से सामने रखने वाले दो लेख इन दिनों चर्चा का विषय हैं। वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार विष्णु नागर और वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र शर्मा ने अपने-अपने लेखों में सत्ता, राजनीति, चुनावी व्यवस्था और राजनीतिक संस्कृति को लेकर तीखे सवाल उठाए हैं।विष्णु नागर ने अपने व्यंग्यात्मक लेख ‘हत्यारा राज’ में अंतरराष्ट्रीय राजनीति से लेकर भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था तक के विभिन्न प्रसंगों को आधार बनाया है। लेख में इजरायल-गाजा संघर्ष, नेतन्याहू सरकार पर लगाए गए आरोपों, इराक युद्ध और जॉर्ज डब्ल्यू. बुश के संदर्भों के माध्यम से सत्ता में बैठे लोगों की जवाबदेही और नैतिक जिम्मेदारी पर सवाल उठाया गया है।

लेख का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारत की चुनावी व्यवस्था से जुड़े विवादों पर केंद्रित है। लेखक ने चुनाव आयोग और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों को लेकर व्यंग्यात्मक शैली में अपनी आलोचना प्रस्तुत की है। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर उठ रहे सवालों को अपने लेख का हिस्सा बनाया है।वहीं, राजेंद्र शर्मा ने अपने व्यंग्य ‘भक्त, भक्त ना रहे, आशीर्वाद का दिया न जल सका!’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों और ‘आशीर्वाद का दिया’ जलाने के आह्वान को व्यंग्य का केंद्र बनाया है। उन्होंने सरकारी स्तर पर आयोजित कार्यक्रमों, जनता की भागीदारी और राजनीतिक समर्थकों की भूमिका पर कटाक्ष करते हुए राजनीतिक संस्कृति पर सवाल उठाए हैं।शर्मा ने अपने लेख में जन्मदिन समारोहों पर होने वाले खर्च, सरकारी आयोजनों और आम जनता की भागीदारी के बीच के अंतर को व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। साथ ही उन्होंने चुनावी व्यवस्था और मतदाता सूची से जुड़े SIR (Special Intensive Revision) के संदर्भ को भी अपने व्यंग्य में शामिल किया है।दोनों लेखकों की शैली अलग-अलग होने के बावजूद उनके लेखों का केंद्रीय विषय सत्ता और राजनीति में जवाबदेही का सवाल है। जहां विष्णु नागर ने अंतरराष्ट्रीय घटनाओं और भारतीय चुनावी व्यवस्था को जोड़कर व्यंग्य किया है, वहीं राजेंद्र शर्मा ने प्रधानमंत्री के जन्मदिन से जुड़े राजनीतिक आयोजनों और जनभागीदारी को अपना विषय बनाया है।यह दोनों लेख राजनीतिक व्यंग्य की शैली

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