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ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का राजनीतिक अर्थशास्त्र।

युद्ध का झटका जनता की जेब पर, ‘अंडर-रिकवरी’ के दावे और तेल कंपनियों के मुनाफे पर उठे सवाल

विशेष आलेख | उत्कर्ष भारद्वाजअंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते

पेट्रोल-डीजल महंगा होने के पीछे सिर्फ अंतरराष्ट्रीय संकट या ‘अंडर-रिकवरी’ ही जिम्मेदार है?

ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल महंगा होते ही परिवहन, खाद, कृषि लागत से लेकर बाजार में पहुंचने वाली रोजमर्रा की वस्तुओं तक की कीमतें प्रभावित होती हैं। ऐसे में सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय तेल संकट का पूरा बोझ आखिर उपभोक्ताओं पर ही क्यों डाला जाए?आलेख में तर्क दिया गया है कि ईंधन की कीमतों के निर्धारण में इस्तेमाल होने वाला ‘इंपोर्ट पैरिटी प्राइस’ यानी आयात समता मूल्य वास्तविक घरेलू लागत को पूरी तरह नहीं दर्शाता। इस व्यवस्था में घरेलू स्तर पर अलग-अलग स्रोतों से खरीदे गए कच्चे तेल की वास्तविक लागत के बजाय उस कीमत को आधार बनाया जाता है, जिस पर विदेश से तैयार पेट्रोलियम उत्पाद आयात करने की काल्पनिक लागत आती है।‘अंडर-रिकवरी’ पर बड़ा सवालतेल कंपनियों को होने वाली कथित ‘अंडर-रिकवरी’ को लेकर भी आलेख सवाल उठाता है। तर्क है कि यदि भारतीय रिफाइनरियों ने पहले से खरीदा हुआ कच्चा तेल, घरेलू स्रोतों या रियायती दरों पर उपलब्ध कच्चे तेल का इस्तेमाल किया है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार की ऊंची बेंचमार्क कीमत को ही वास्तविक नुकसान मानना कितना उचित है?आलेख के मुताबिक, इसी गणना के आधार पर ईंधन की कीमत बढ़ाने का दबाव पैदा होता है और अंततः इसका असर मजदूर, किसान, यात्री, ट्रांसपोर्टर और आम उपभोक्ता पर पड़ता है।टैक्स संरचना पर भी सवाललेख में केंद्र और राज्यों के बीच ईंधन कर से मिलने वाले राजस्व के बंटवारे को भी महत्वपूर्ण मुद्दा बताया गया है। इसमें दावा किया गया है कि पेट्रोल-डीजल पर लगाए जाने वाले विभिन्न सेस और अतिरिक्त शुल्क का बड़ा हिस्सा राज्यों के साथ साझा नहीं होता। इससे राज्यों की वित्तीय हिस्सेदारी और संघीय ढांचे को लेकर बहस तेज होती है।निजी तेल कंपनियों को फायदा पहुंचाने का आरोपआलेख का सबसे तीखा सवाल सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों और निजी रिफाइनरियों के बीच प्रतिस्पर्धा को लेकर है। इसमें दावा किया गया है कि यदि सरकारी तेल कंपनियां वास्तविक घरेलू लागत के आधार पर खुदरा कीमत तय करें तो निजी रिफाइनरियों के लिए प्रतिस्पर्धा की स्थिति बदल सकती है।रिलायंस और नायरा एनर्जी जैसी निजी रिफाइनरियों के निर्यात कारोबार, रिफाइनिंग मार्जिन और अंतरराष्ट्रीय कीमतों से मिलने वाले संभावित अतिरिक्त लाभ को लेकर भी लेख में सवाल उठाए गए हैं।रूसी तेल और विदेश नीति का मुद्दाआलेख में भारत की ऊर्जा नीति को विदेश नीति से जोड़ते हुए रूस और ईरान से कच्चे तेल की खरीद का मुद्दा भी उठाया गया है। लेखक का तर्क है कि सस्ते और विविध स्रोतों से कच्चा तेल खरीदने की नीति भारत को अंतरराष्ट्रीय संकटों से बचाने में मदद कर सकती थी।लेख में आरोप लगाया गया है कि अमेरिकी दबाव के कारण रूसी और ईरानी तेल से दूरी बनाने का असर अंततः भारत की ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। हालांकि, यह लेखक का राजनीतिक-आर्थिक विश्लेषण है और इन दावों पर सरकार तथा संबंधित कंपनियों का पक्ष अलग हो सकता है।आगे का रास्ता क्या?आलेख में ईंधन की कीमतों को वास्तविक घरेलू लागत से जोड़ने, ‘इंपोर्ट पैरिटी प्राइस’ आधारित व्यवस्था की समीक्षा करने, राज्यों को ईंधन करों में उनका संवैधानिक हिस्सा देने और निजी रिफाइनरियों के असाधारण मुनाफे पर प्रभावी कर लगाने की मांग की गई है।लेखक का निष्कर्ष है कि अंतरराष्ट्रीय युद्ध और भू-राजनीतिक संकट का पूरा आर्थिक बोझ आम जनता पर डालने के बजाय सरकार को ऐसी ऊर्जा नीति बनानी चाहिए, जिसमें उपभोक्ता हित, राज्यों की वित्तीय हिस्सेदारी और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों की भूमिका को प्राथमिकता मिले।नोट: यह आलेख लेखक के विचार और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें दिए गए आर्थिक, राजनीतिक और नीतिगत दावों को उसी संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए।

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