


एसएफआई महासचिव सृजन भट्टाचार्य का दावा—नीट पेपर लीक से उपजा युवाओं का आक्रोश मई-जुलाई में बड़े जनआंदोलन में बदला।

नई दिल्ली। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के महासचिव सृजन भट्टाचार्य ने अपने आलेख ‘यह सबसे बुरा समय था, यह सबसे अच्छा समय भी था!’ में मई से जुलाई 2026 के दौरान शिक्षा व्यवस्था और कथित परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ उभरे छात्र-युवा आंदोलन को देश के हालिया बड़े जनआंदोलनों में से एक बताया है। उन्होंने दावा किया कि नीट पेपर लीक, सीबीएसई ओएसएम मूल्यांकन में कथित गड़बड़ी और युवाओं से जुड़ी विवादित टिप्पणियों के बाद नई पीढ़ी में सरकार के प्रति असंतोष खुलकर सामने आया।आलेख के अनुसार, 12 मई को नीट पेपर लीक के मुद्दे पर एसएफआई ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और प्रभावित छात्रों को न्याय दिलाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। संगठन ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) को समाप्त करने और नई शिक्षा नीति-2020 को वापस लेने की मांग भी उठाई।सोशल मीडिया से सड़कों तक पहुंचा आंदोलनलेख में कहा गया है कि शुरुआत में आंदोलन को अपेक्षित मीडिया कवरेज नहीं मिली, लेकिन युवाओं के बीच सोशल मीडिया पर बढ़ते असंतोष ने इसे व्यापक रूप देना शुरू किया। इसी क्रम में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) नाम से सोशल मीडिया अभियान सामने आया और 6 जून को दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के जरिए आंदोलन ने सार्वजनिक स्वरूप ग्रहण किया।सृजन भट्टाचार्य के मुताबिक, एसएफआई ने सीजेपी से जुड़े आंदोलन में भाग लेते हुए परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और शिक्षा क्षेत्र में संरचनात्मक सुधार की मांग को आगे बढ़ाया। आलेख में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और जंतर-मंतर को आंदोलन का प्रमुख केंद्र बनने का भी उल्लेख किया गया है।20 जुलाई को आंदोलन ने लिया उग्र मोड़आलेख में 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च को आंदोलन का निर्णायक मोड़ बताया गया है। लेखक का दावा है कि प्रदर्शनकारियों की मांग शिक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों की जवाबदेही तय करने और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की थी। लेख में पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं और कहा गया है कि बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी घायल हुए तथा कई लोगों को हिरासत में लिया गया।एसएफआई ने दावा किया कि उसके 40 से अधिक कार्यकर्ताओं को प्राथमिक उपचार के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा। हालांकि, आलेख में किए गए पुलिस कार्रवाई से संबंधित आरोपों को लेखक के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।देशभर में प्रदर्शन का दावालेख के मुताबिक, 20 जुलाई की घटनाओं के बाद आंदोलन का प्रभाव दिल्ली से बाहर भी फैल गया। कोलकाता, पटना और मुंबई समेत कई शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। एसएफआई ने 23 राज्यों में प्रदर्शन किए जाने का दावा किया है। लेखक के अनुसार, आंदोलन ने शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा में पारदर्शिता और युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों को व्यापक राजनीतिक बहस का विषय बना दिया।धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को बताया आंदोलन की जीतआलेख में दावा किया गया है कि सीजेपी प्रतिनिधियों और सरकार के बीच कई दौर की बातचीत हुई। लेखक के अनुसार, नीट पीड़ितों के परिवारों को मुआवजा और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने जैसी मांगों पर सहमति बनी, लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के मुद्दे पर सरकार टालमटोल करती रही।लेखक का दावा है कि बढ़ते जनदबाव के बीच 25 जुलाई की दोपहर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। इसे सृजन भट्टाचार्य ने नई पीढ़ी और छात्र आंदोलन की बड़ी राजनीतिक जीत करार दिया है।अब आगे की दिशा पर सवालआलेख में आंदोलन की भविष्य की दिशा को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। लेखक ने पूछा है कि क्या यह आंदोलन केवल एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित रहेगा या शिक्षा व्यवस्था में व्यापक संरचनात्मक बदलाव की मांग को आगे बढ़ाएगा।एसएफआई की ओर से सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने, शिक्षा नीतियों में वास्तविक बदलाव और परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता के लिए संघर्ष जारी रखने की बात कही गई है।लेख के अंत में सृजन भट्टाचार्य ने मार्क्स के विचार का उल्लेख करते हुए कहा है कि जब कोई विचार आम जनता द्वारा अपना लिया जाता है, तो वह भौतिक शक्ति बन जाता है। उन्होंने मई-जुलाई 2026 के घटनाक्रम को इसी जनशक्ति के उभार के रूप में प्रस्तुत किया है।नोट: यह समाचार एसएफआई महासचिव सृजन भट्टाचार्य के प्रकाशित आलेख में किए गए दावों और उनके राजनीतिक विश्लेषण पर आधारित है। लेख में सरकार, पुलिस और अन्य पक्षों के संबंध में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस प्रस्तुति में नहीं की गई है।
