जनकवि मुकुट बिहारी सरोज शताब्दी वर्ष में गौहर रज़ा को मिला ‘सरोज सम्मान-2026’, बोले— सड़कों पर उभरा जनाक्रोश कविता की जीत Madhya Pradesh news SKN Bharat

ग्वालियर। जनकवि मुकुट बिहारी सरोज की जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित प्रतिष्ठित ‘जनकवि मुकुट बिहारी सरोज समारोह’ में देश के प्रसिद्ध कवि, लेखक, वैज्ञानिक एवं फिल्मकार गौहर रज़ा को ‘सरोज।

सम्मान-2026′ से सम्मानित किया गया। पिछले लगभग 25 वर्षों से प्रत्येक वर्ष 26 जुलाई को आयोजित होने वाला यह समारोह इस वर्ष भी पूरे साहित्यिक गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ।सम्मान ग्रहण करने के बाद गौहर रज़ा ने कहा कि देश ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां पिछली पीढ़ियों के सपने बिखरते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे समय में मुकुट बिहारी सरोज जैसे जनकवियों की रचनाएं समाज को दिशा देती हैं। उन्होंने कहा कि छोटी-सी कविता और लेख भी सत्ता के लिए चुनौती बन सकते हैं। उन्होंने नाजी जर्मनी के कवि पास्टर निमोलर तथा फैज़ अहमद फैज़ की प्रसिद्ध नज़्म “हम देखेंगे” का उल्लेख करते हुए कहा कि संघर्ष के रास्ते पर कलाकारों और साहित्यकारों की भूमिका सबसे अहम होती है। उन्होंने सरोज स्मृति न्यास को इस परंपरा को जीवित रखने के लिए बधाई दी।समारोह की अध्यक्षता यश मालवीय ने की। न्यास की सचिव मान्यता सरोज ने बताया कि यह सम्मान उन रचनाकारों को समर्पित है, जिन्होंने सत्ता, पूंजी और संस्थागत उपेक्षा के बावजूद मानवता, लोकतंत्र और जनहित के पक्ष में अपनी लेखनी को समर्पित रखा। उन्होंने बताया कि अब तक 23 साहित्यकारों को इस सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।कार्यक्रम में वरिष्ठ गीतकार मोहन अंबर के गीतों पर केंद्रित डॉ. भगवान स्वरूप शर्मा ‘चैतन्य’ द्वारा संपादित ‘लोकमंगल’ के विशेषांक का विमोचन भी किया गया। समारोह के दूसरे सत्र में देशभर से आए कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। गौहर रज़ा, यश मालवीय, मालिनी गौतम, मंजुल मयंक, महेश कटारे ‘सुगम’, महेंद्र मिहोनवी तथा शेफाली शर्मा ने समकालीन सामाजिक, राजनीतिक और मानवीय सरोकारों पर आधारित कविताएं प्रस्तुत कर श्रोताओं की खूब सराहना बटोरी।वक्ताओं ने कविता को लोकतांत्रिक चेतना की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति बताते हुए कहा कि जनकवि मुकुट बिहारी सरोज की वैचारिक विरासत आज भी समाज को नई दिशा देने का काम कर रही है। 2005 से लगातार दिए जा रहे इस सम्मान ने साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है और आर्थिक सीमाओं के बावजूद इसकी परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है।

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