
सौ साल के इतिहास में सकारात्मक उपलब्धि के नाम पर ‘निल बटा सन्नाटा’, अब दूसरों के कंधों पर बंदूक रखकर खुद को बड़ा दिखाने का चल रहा खेल: बादल सरोज.

विशेष प्रतिनिधि, नई दिल्ली।रंग-बिरंगे मुखौटे पहनकर अपने चेहरे की कालिमा को छुपाना और दूसरों के विराट व्यक्तित्व की आड़ में अपने बौने अक्स को बड़ा दिखाना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके कुनबे का चौबीसों घंटे चलने वाला शगल बन चुका है। अपनी स्थापना के 100 साल पूरे करने जा रहे इस संगठन की यह मजबूरी भी है, क्योंकि पूरे इतिहास में सकारात्मक उपलब्धि के नाम पर इनके पास दिखाने को कुछ नहीं है। इस हड़बड़ाहट में ये लोग आधारहीन और जाहिर सच्चाई से ठीक उलट दावों की खेप दर खेप पेश कर रहे हैं। इस मामले में इन्होंने अपने प्रणेता गोयबल्स को भी पीछे छोड़ दिया है।बंकिम बाबू से लेकर श्यामाप्रसाद तक: गढ़े जा रहे हैं झूठे नायकहाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्ला भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचंद्र चटर्जी का “सम्मान” किया। मृत्यु के 132 वर्ष बाद जिन बंकिम बाबू को सम्मानित किया गया, वे वास्तविक लेखक नहीं, बल्कि कुनबे द्वारा अपनी सहूलियत के हिसाब से लीप-पोतकर गढ़े गए चरित्र थे। बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने समय में ब्रिटिश राज के खिलाफ जनता में चेतना जगाई थी, जिसकी चाकरी में संघ का क्या योगदान था, यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है। बंकिम बाबू ने बंगाल के जमींदारों द्वारा गरीब किसानों के शोषण और जाति व्यवस्था की तीखी आलोचना की थी और भारत में पहली बार साम्यवाद की स्थापना की बात उठाई थी।ऐसा ही एक बड़ा झूठ श्यामाप्रसाद मुखर्जी को बंगाल की एकता का प्रतीक बताकर बोला जाता है। वास्तविकता यह है कि वे हिंदू-मुस्लिम के आधार पर भारत विभाजन की सावरकरी धारणा के ध्वजावाहक थे। बंगाल के बंटवारे की बात करने वाले सोहरावर्दी की मुस्लिम लीग सरकार में मंत्री रहते हुए मुखर्जी ने वायसराय और अंग्रेज हुकूमत को चिट्ठियाँ लिखकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को सख्ती से कुचल देने की सलाह दी थी।
विशेष प्रतिनिधि, नई दिल्ली।
रंग-बिरंगे मुखौटे पहनकर अपने चेहरे की कालिमा को छुपाना और दूसरों के विराट व्यक्तित्व की आड़ में अपने बौने अक्स को बड़ा दिखाना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और उसके कुनबे का चौबीसों घंटे चलने वाला शगल बन चुका है। अपनी स्थापना के 100 साल पूरे करने जा रहे इस संगठन की यह मजबूरी भी है, क्योंकि पूरे इतिहास में सकारात्मक उपलब्धि के नाम पर इनके पास दिखाने को कुछ नहीं है। इस हड़बड़ाहट में ये लोग आधारहीन और जाहिर सच्चाई से ठीक उलट दावों की खेप दर खेप पेश कर रहे हैं। इस मामले में इन्होंने अपने प्रणेता गोयबल्स को भी पीछे छोड़ दिया है।
बंकिम बाबू से लेकर श्यामाप्रसाद तक: गढ़े जा रहे हैं झूठे नायक
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्ला भाषा के प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचंद्र चटर्जी का “सम्मान” किया। मृत्यु के 132 वर्ष बाद जिन बंकिम बाबू को सम्मानित किया गया, वे वास्तविक लेखक नहीं, बल्कि कुनबे द्वारा अपनी सहूलियत के हिसाब से लीप-पोतकर गढ़े गए चरित्र थे। बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने समय में ब्रिटिश राज के खिलाफ जनता में चेतना जगाई थी, जिसकी चाकरी में संघ का क्या योगदान था, यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है। बंकिम बाबू ने बंगाल के जमींदारों द्वारा गरीब किसानों के शोषण और जाति व्यवस्था की तीखी आलोचना की थी और भारत में पहली बार साम्यवाद की स्थापना की बात उठाई थी।
ऐसा ही एक बड़ा झूठ श्यामाप्रसाद मुखर्जी को बंगाल की एकता का प्रतीक बताकर बोला जाता है। वास्तविकता यह है कि वे हिंदू-मुस्लिम के आधार पर भारत विभाजन की सावरकरी धारणा के ध्वजावाहक थे। बंगाल के बंटवारे की बात करने वाले सोहरावर्दी की मुस्लिम लीग सरकार में मंत्री रहते हुए मुखर्जी ने वायसराय और अंग्रेज हुकूमत को चिट्ठियाँ लिखकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को सख्ती से कुचल देने की सलाह दी थी।

