गाली वॉर’ पर घमासान: युवाओं की भाषा पर उठे सवाल, ‘संस्कारी’ राजनीति पर भी निशाना।

मध्य् प्रदेश न्यूज़ skn bharat

सीमा चिश्ती के आलेख में विरोध प्रदर्शनों की भाषा, सत्ता की जवाबदेही और सरकारी प्रचार तंत्र पर तीखी टिप्पणी।

नई दिल्ली। युवाओं के हालिया विरोध प्रदर्शनों में इस्तेमाल की गई अभद्र और आपत्तिजनक भाषा को लेकर छिड़ी बहस अब राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का मुद्दा बन गई है। ‘द वायर’ के लिए लिखे अपने आलेख में लेखिका सीमा चिश्ती ने सवाल उठाया है कि विरोध और आक्रोश की भाषा को उसके संदर्भ से अलग करके क्यों देखा जा रहा है। उन्होंने केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के अध्यक्ष शशि शेखर वेम्पति समेत उन लोगों की आलोचना की है, जिन्होंने प्रदर्शनकारी युवाओं द्वारा अपशब्दों के इस्तेमाल पर चिंता जताई है।आलेख में कहा गया है कि विरोध प्रदर्शनों की प्रकृति ही आक्रोश और असहमति से जुड़ी होती है। ऐसे में प्रदर्शनकारियों की भाषा को केवल शब्दों के आधार पर परखने के बजाय यह देखना जरूरी है कि वे किस परिस्थिति में और किसके खिलाफ अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। लेखिका का तर्क है कि सत्ता के शक्तिशाली केंद्र के खिलाफ युवाओं की तीखी भाषा और कमजोर तबके को निशाना बनाने वाली अभद्र भाषा को एक ही नजर से नहीं देखा जा सकता।लेख में युवाओं के आक्रोश के पीछे बेरोजगारी, पेपर लीक, शिक्षा व्यवस्था और कथित भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता से रखा गया है। लेखिका के अनुसार, जब युवाओं को लगता है कि उनकी सामान्य भाषा में कही गई बात सत्ता तक नहीं पहुंच रही, तो उनका विरोध अधिक तीखे और आक्रामक रूप में सामने आता है।विज्ञापन खर्च पर भी सवालआलेख में केंद्र सरकार के विज्ञापन खर्च को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। लेखिका ने सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया है कि वर्ष 2014-15 से 2024-25 के बीच केंद्र की भाजपा नीत सरकार ने विज्ञापन पर करीब 5,987.46 करोड़ रुपये खर्च किए। लेख में कहा गया है कि राजनीतिक प्रचार और सार्वजनिक संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर भी गंभीर बहस की जरूरत है।सीमा चिश्ती ने सत्ता प्रतिष्ठान की भाषा और व्यवहार के बीच कथित विरोधाभास का मुद्दा भी उठाया है। आलेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा भाजपा नेताओं के पूर्व में दिए गए कुछ विवादित बयानों का उल्लेख करते हुए सवाल किया गया है कि युवाओं की भाषा पर आपत्ति जताने वाले राजनीतिक और सामाजिक वर्गों ने अतीत में नेताओं की तीखी एवं विवादित भाषा पर समान आपत्ति क्यों नहीं जताई।‘संस्कारी भाषा’ बनाम आम बोलचाललेख में सरकारी हिंदी और सार्वजनिक संवाद की भाषा को लेकर भी तीखी टिप्पणी की गई है। लेखिका का कहना है कि आम लोगों की रोजमर्रा की हिंदी में उर्दू, फारसी, अंग्रेजी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द सहज रूप से शामिल हैं। ऐसे में अत्यधिक संस्कृतनिष्ठ और कठिन भाषा को जनता पर थोपना संवाद को आसान बनाने के बजाय उसे आम लोगों से दूर कर सकता है।आलेख में यह भी कहा गया है कि भाषा का मूल्य केवल उसकी शालीनता से नहीं, बल्कि उसके संदर्भ और उसके प्रभाव से भी तय होता है। लेखिका ने सवाल उठाया है कि क्या हिंसा या भेदभाव को शालीन शब्दों में व्यक्त कर देना उसे कम गंभीर बना देता है, जबकि किसी प्रदर्शनकारी का तीखा या अपशब्द वाला पोस्टर अपने आप में ज्यादा गंभीर माना जाए।सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का भी हवालालेख में 18 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ द्वारा अभद्र भाषा और अश्लीलता के बीच अंतर को लेकर की गई टिप्पणी का भी उल्लेख किया गया है। आलेख के मुताबिक अदालत ने कहा था कि केवल आपत्तिजनक या असभ्य भाषा अपने आप में अश्लीलता नहीं बन जाती, जब तक उसमें कामुकता या सुनने-देखने वालों को भ्रष्ट करने की प्रवृत्ति न हो।लेखिका ने इसी संदर्भ को युवाओं के आंदोलन से जोड़ते हुए कहा है कि पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं को लेकर युवाओं का आक्रोश महज व्यक्तिगत विवाद की तुलना में कहीं व्यापक सामाजिक मुद्दे से जुड़ा है।‘गाली वॉर’ के पीछे मीडिया की भूमिका पर भी सवालआलेख में टेलीविजन चैनलों की आक्रामक बहसों और राजनीतिक बयानबाजी को भी मौजूदा सार्वजनिक भाषा के लिए जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की गई है। लेखिका के अनुसार, लगातार चीखती-चिल्लाती बहसों और तीखे राजनीतिक संवादों ने समाज में पहले से मौजूद आक्रामकता को और बढ़ाया है।अंत में लेखिका ने कहा है कि जब आक्रोशित युवा अपनी बात रखने की कोशिश करता है और सत्ता उसकी आवाज सुनने से इनकार करती है, तो वह सड़क पर उतरता है। ऐसे में उसकी भाषा भी सड़क की भाषा बन जाती है। आलेख का निष्कर्ष है कि युवाओं के शब्दों पर बहस करने से पहले उन परिस्थितियों को समझना जरूरी है, जिन्होंने उन्हें इस तरह विरोध करने के लिए मजबूर किया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *