राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा गायब, विचारधारा और इतिहास पर फिर उठे सवाल।

रानीगंज में ‘महापंडित’ की प्रतिमा हटाए जाने पर लेखिका मालिनी भट्टाचार्य ने जताई चिंता।

कोलकाता। पश्चिम बंगाल के औद्योगिक शहर रानीगंज में 20 जुलाई की आधी रात राहुल सांकृत्यायन की आदमकद प्रतिमा को कथित तौर पर अज्ञात लोगों द्वारा हटा दिए जाने की घटना ने इतिहास, विचारधारा और सार्वजनिक स्मृतियों को लेकर नई बहस छेड़ दी है। रानीगंज के एक प्रमुख चौराहे पर लगी प्रतिमा के स्थान पर सुबह ईंट-पत्थर बिखरे मिले। स्थानीय लोगों ने पुलिस को इसकी सूचना दी, लेकिन लेख के अनुसार अब तक किसी आरोपी की पहचान नहीं हो सकी है।लेखिका मालिनी भट्टाचार्य ने अपने आलेख ‘राहुल सांकृत्यायन से कौन डरता है?’ में घटना को लेकर प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि स्थानीय प्रशासन की ओर से इस मामले में अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखाई गई। वहीं, प्रतिमा हटाए जाने के विरोध में स्थानीय वामपंथी कार्यकर्ताओं और नागरिकों की ओर से आयोजित सभा को लेकर कथित धमकियों का भी उन्होंने उल्लेख किया है।प्रतिमा का है ऐतिहासिक जुड़ावआलेख के मुताबिक रानीगंज में राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा की स्थापना उनके जन्मशती समारोहों से जुड़ी थी। वर्ष 1993 में राहुल सांकृत्यायन की जन्मशती के अवसर पर उनके जीवन और योगदान को याद करने के लिए रानीगंज के मजदूर नेताओं, प्रगतिशील लेखकों, कलाकारों और शिक्षकों ने कई कार्यक्रम आयोजित किए थे।इन आयोजनों का उद्देश्य राहुल सांकृत्यायन को केवल विद्वान, दार्शनिक और भाषाविद् के रूप में नहीं, बल्कि जननेता, घुमक्कड़, सामाजिक चिंतक और शोषण-विरोधी विचारक के रूप में लोगों के बीच प्रस्तुत करना था। लेख के अनुसार 1994 में रानीगंज चौराहे पर उनकी प्रतिमा स्थापित की गई थी। तब से हर वर्ष 9 अप्रैल को उसी स्थान पर उनका जन्मदिन मनाया जाता रहा है।विद्वान से जननेता तक का सफरराहुल सांकृत्यायन का जन्म केदारनाथ पांडे के रूप में बिहार के पंदहा गांव में हुआ था। ज्ञान की तलाश में उन्होंने देश-विदेश की लंबी यात्राएं कीं और बौद्ध दर्शन, इतिहास, भाषा तथा दर्शन का गहन अध्ययन किया। तिब्बत, श्रीलंका और सोवियत रूस की यात्राओं ने उनके वैचारिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और जेल भी गए। बाद में किसान आंदोलन से जुड़े तथा अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष रहे। लेख में उन्हें भारतीय परिस्थितियों में ऐतिहासिक भौतिकवाद और मार्क्सवादी विचारों को समझने तथा लागू करने का प्रयास करने वाला महत्वपूर्ण चिंतक बताया गया है।‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ का फिर उल्लेखआलेख में राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक ‘रामराज्य और मार्क्सवाद’ का विशेष उल्लेख करते हुए कहा गया है कि उन्होंने धार्मिक आस्था के नाम पर सामाजिक शोषण और असमानता को उचित ठहराने वाली प्रवृत्तियों की आलोचना की थी।लेखिका का तर्क है कि आज के दौर में, जब धार्मिक और वैचारिक प्रतीकों का इस्तेमाल सामाजिक-राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है, राहुल सांकृत्यायन की आलोचनात्मक और भौतिकवादी दृष्टि को फिर से पढ़ने की जरूरत है।‘राहुल सांकृत्यायन से कौन डरता है?’आलेख के अंतिम हिस्से में लेखिका ने सवाल उठाया है कि रानीगंज में प्रतिमा हटाने वालों को राहुल सांकृत्यायन के जीवन और विचारों की जानकारी थी या यह केवल वामपंथी और प्रगतिशील गतिविधियों से जुड़े सार्वजनिक स्थल को निशाना बनाने की घटना थी।मालिनी भट्टाचार्य का कहना है कि राहुल सांकृत्यायन का महत्व केवल उनकी विशाल विद्वता में नहीं, बल्कि सवाल पूछने, तर्क करने और स्वतंत्र रूप से सोचने की उनकी क्षमता में भी है। इसी आधार पर आलेख का केंद्रीय सवाल सामने आता है—राहुल सांकृत्यायन से आखिर डरता कौन है?

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