
वीबी-ग्राम-जी के नियमों में बेनकाब हुआ मज़दूर-विरोधी चरित्र, मनरेगा के अधिकार आधारित ढांचे पर उठे गंभीर सवाल।

वीबी-ग्राम-जी के प्रस्तावित नियमों पर डॉ. विक्रम सिंह का विस्तृत विश्लेषण। लेख में मनरेगा की समाप्ति, 125 दिन रोजगार के दावे, फंड आवंटन, ई-केवाईसी, राज्यों की भूमिका और ग्रामीण मज़दूरों के अधिकारों पर उठाए गए गंभीर सवालों की चर्चा की गई है।


-ग्राम-जी के प्रस्तावित नियमों पर उठे सवाल, मज़दूर संगठनों ने जताई आपत्तिनई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित वीबी-ग्राम-जी योजना के नियमों को लेकर ग्रामीण और खेत मज़दूर संगठनों ने गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उनका कहना है कि यह व्यवस्था
मनरेगा की अधिकार-आधारित प्रकृति को कमजोर कर सकती है और ग्रामीण रोजगार के ढांचे में बड़े बदलाव का रास्ता खोलती है।लेख में कहा गया है कि प्रस्तावित नियमों के तहत रोजगार उपलब्ध कराने, फंड आवंटन, मजदूरी भुगतान, बेरोजगारी भत्ता और योजना की निगरानी संबंधी शक्तियां पहले की तुलना में अधिक केंद्रीयकृत दिखाई देती हैं। आलोचकों का आरोप है कि इससे राज्यों की भूमिका सीमित होगी और रोजगार की मांग के अनुरूप संसाधन उपलब्ध कराने की व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।लेख में 125 दिनों के रोजगार की प्रस्तावित गारंटी पर भी सवाल उठाए गए हैं। लेखक का दावा है कि उपलब्ध वित्तीय प्रावधानों और विभिन्न राज्यों के आंकड़ों के आधार पर इतने व्यापक स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराना व्यावहारिक रूप से कठिन दिखाई देता है।प्रस्तावित नियमों में ई-केवाईसी को अनिवार्य किए जाने पर भी चिंता व्यक्त की गई है। लेख के अनुसार तकनीकी कारणों से बड़ी संख्या में श्रमिकों के जॉब कार्ड प्रभावित हो सकते हैं, जिससे वे योजना के लाभ से वंचित होने का जोखिम उठा सकते हैं।राष्ट्रीय संचालन समिति की संरचना को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। लेखक का कहना है कि समिति में राज्यों और श्रमिक संगठनों का प्रतिनिधित्व सीमित है, जबकि निर्णय लेने की प्रमुख शक्तियां केंद्र सरकार के पास केंद्रित रहती हैं। इसे संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए चुनौती बताया गया है।लेख में यह भी कहा गया है कि यदि कोई राज्य अपने निर्धारित आवंटन से अधिक रोजगार उपलब्ध कराता है तो अतिरिक्त वित्तीय बोझ उसी राज्य को उठाना होगा। लेखक के अनुसार इससे राज्यों को अधिक रोजगार देने के लिए हतोत्साहित किया जा सकता है।सोशल ऑडिट, पारदर्शिता और स्वतंत्र लोकपाल व्यवस्था को प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है ताकि शिकायतों का निष्पक्ष निपटारा हो सके और जवाबदेही सुनिश्चित हो।लेख के अंत में लेखक ने निष्कर्ष निकाला है कि वीबी-ग्राम-जी का मौजूदा प्रारूप मनरेगा के अधिकार-आधारित मॉडल से अलग है। उन्होंने सुझाव दिया है कि प्रस्तावित नियमों पर व्यापक सार्वजनिक चर्चा हो, राज्यों और श्रमिक संगठनों की राय को महत्व दिया जाए तथा ग्रामीण रोजगार को कानूनी अधिकार के रूप में मजबूत बनाए ।
