
शिक्षा से रोजगार तक: क्या देश अंधकार की ओर बढ़ रहा है?
तमसो मा ज्योतिर्गमय’ से ‘ज्योतिर्मा तमसोगमय’ तक: शिक्षा पर गंभीर सवाल
नई दिल्ली। शिक्षा व्यवस्था, नई शिक्षा नीति, रोजगार, अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर लेखक एवं अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव बादल सरोज ने एक विस्तृत लेख जारी कर केंद्र सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।अपने लेख “ज्योतिर्मा तमसोगमय सदो मा असतोगमय” में उन्होंने ओडिशा की स्कूली पुस्तकों में सामने आई बड़ी संख्या में त्रुटियों, प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े विवाद, शिक्षा के निजीकरण, कोचिंग संस्कृति, युवाओं में बढ़ती निराशा तथा रोजगार संकट जैसे मुद्दों को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ बताया है।लेख में दावा किया गया है कि शिक्षा व्यवस्था में हो रहे बदलावों का असर युवाओं के भविष्य, वैज्ञानिक सोच और देश की आर्थिक दिशा पर पड़ रहा है। लेखक ने नई शिक्षा नीति, पाठ्यक्रमों में बदलाव और शिक्षा के बढ़ते निजीकरण की आलोचना करते हुए कहा कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता और समान अवसर प्रभावित हो रहे हैं।बादल सरोज ने अपने लेख में प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन के हालिया विचारों का भी उल्लेख करते हुए रोजगार और कौशल विकास को लेकर अपनी टिप्पणी दी है। साथ ही उन्होंने प्रतियोगी परीक्षाओं, छात्र आंदोलनों और शिक्षा संस्थानों से जुड़े हालिया घटनाक्रमों का हवाला देते हुए सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए हैं।लेख के अंत में लेखक ने शिक्षा, वैज्ञानिक सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए नागरिकों से जागरूक और सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की है।(नोट: इस समाचार में उल्लिखित विचार लेखक बादल सरोज के प्रकाशित लेख पर आधारित हैं। SKN भारत – सच की नज़र इन विचारों की स्वतंत्र पुष्टि या समर्थन का दावा नहीं करता।)यदि यह आपकी वेबसाइट SKN भारत – सच की नज़र पर प्रकाशित होगा, तो इसे “विचार/आलेख” श्रेणी में प्रकाशित करना अधिक उपयुक्त रहेगा।
